1. होम
  2. मुद्राएँ
  3. अभय मुद्रा (निर्भयता की मुद्रा)

अभय मुद्रा (निर्भयता की मुद्रा): अर्थ, कथा और करने की विधि

अभय मुद्रा में दायाँ हाथ उठा रहता है और खुली हथेली बाहर की ओर, जैसा अनगिनत बुद्ध प्रतिमाओं और हिन्दू देवी-देवताओं में दिखता है। इसका संदेश है "डरो मत", और आप इसे साहस के एक छोटे अभ्यास के रूप में खुद भी कर सकते हैं।

कैसे करें, चरण-दर-चरण

  1. सीधे बैठें, या पैरों को कूल्हों जितनी दूरी पर रखकर सीधे खड़े हों, कंधे ढीले रखें।
  2. दायीं कोहनी मोड़ें और दायाँ हाथ कंधे की ऊँचाई तक, शरीर से थोड़ा आगे उठाएँ।
  3. हथेली आगे की ओर करें और पाँचों उँगलियाँ सीधी, साथ-साथ और ऊपर की ओर रखें।
  4. बायाँ हाथ गोद में हथेली ऊपर करके रखें, या बगल में लटकने दें, हथेली आगे की ओर (वरद मुद्रा)।
  5. धीरे और स्थिर साँस लें, और खुली हथेली को शांति व सुरक्षा का संकेत महसूस करें।
  6. कुछ साँसों या 10 मिनट तक रखें, फिर हाथ नीचे लाकर जाँघ पर टिका दें।

लाभ

  • परंपरा में साहस के लिए और स्थिर मन से डर का सामना करने के लिए
  • परंपरा में दूसरों को और खुद को भरोसा व सुरक्षा देने वाली मुद्रा के रूप में
  • परंपरा में ध्यान के दौरान संकट के सामने बुद्ध की शांति को याद करने के लिए
  • परंपरा में कठिन बातचीत, भाषण या परीक्षा से पहले एक छोटे अभ्यास के रूप में
  • कंधों और ऊपरी बाँह को हल्का सक्रिय रखती है, जिससे बैठते समय सजग रहने में मदद मिलती है

सावधानियाँ

  • कंधे या गर्दन में दर्द हो तो हाथ छाती की ऊँचाई तक नीचे लाएँ या कोहनी तकिये पर टिकाएँ।
  • अभय मुद्रा एक अभ्यास और प्रतीक है, चिंता या पैनिक का इलाज नहीं। डॉक्टर का दिया कोई भी इलाज जारी रखें।
  • बौद्ध और हिन्दू चित्रों व प्रतिमाओं का सम्मान करें: प्रतिमाओं को शौचालय में या ज़मीन पर सजावट के लिए न रखें।

पूरी गाइड पढ़ें (अंग्रेज़ी में)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अभय मुद्रा का क्या अर्थ है?

अभय मुद्रा का अर्थ है "निर्भयता की मुद्रा"। उठी हुई खुली हथेली कहती है "डरो मत" और सुरक्षा व शांति देती है।

अभय मुद्रा किस हाथ से करते हैं?

आमतौर पर दाएँ हाथ से, कंधे की ऊँचाई पर, हथेली बाहर की ओर। बायाँ हाथ अक्सर गोद में रहता है या वरद मुद्रा में नीचे होता है। कुछ प्रतिमाओं में, जैसे सुखोथाई की चलती बुद्ध प्रतिमाओं में, बायाँ हाथ उठा होता है।

अभय मुद्रा के पीछे की कथा क्या है?

सबसे प्रसिद्ध कथा नालागिरि हाथी की है, जिसे देवदत्त ने छोड़ दिया था। बुद्ध ने हाथ उठाया और मैत्री भाव से हाथी को शांत कर दिया, इसलिए यह मुद्रा डर पर शांति की विजय का प्रतीक बन गई।

अभय मुद्रा के क्या लाभ हैं?

परंपरा में इसका उपयोग ध्यान के दौरान या तनाव भरे पल से पहले साहस, शांति और सुरक्षा की भावना के लिए होता है। यह एक प्रतीकात्मक अभ्यास है, चिकित्सा उपचार नहीं।

अभय और वरद मुद्रा में क्या अंतर है?

अभय में हाथ ऊपर उठा होता है, उँगलियाँ ऊपर, जिसका अर्थ है "डरो मत"। वरद में हाथ नीचे होता है, उँगलियाँ नीचे की ओर, जिसका अर्थ है "मैं देता हूँ"। दोनों अक्सर साथ दिखाई जाती हैं।

क्या अभय मुद्रा और अभय हृदय मुद्रा एक ही हैं?

नहीं। अभय मुद्रा एक उठा हुआ हाथ है। अभय हृदय मुद्रा दोनों हाथों की मुद्रा है, जो छाती के सामने कलाइयाँ क्रॉस करके और उँगलियाँ आपस में फँसाकर की जाती है।

मुद्राएँ एकाग्रता और विश्राम की एक पारंपरिक साधना हैं। विशेष स्वास्थ्य प्रभावों पर शोध सीमित है; इन्हें चिकित्सा देखभाल के साथ अपनाएँ, उसकी जगह नहीं।

अपनी भाषा चुनें